दासता से बचाने के लिए भारत में अस्‍थायी अनाज बैंक खुले

by Anuradha Nagaraj | @anuranagaraj | Thomson Reuters Foundation
Thursday, 20 September 2018 11:41 GMT

ARCHIVE PHOTO: A watchman stands next to heaps of sacks filled with paddy at a wholesale grain market in the northern Indian city of Chandigarh November 15, 2014. REUTERS/Ajay Verma

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  • अनुराधा नागराज

    चेन्नई, 20 सितंबर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन) – बारिश के मौसम में आकस्मिक काम की कमी के कारण खाद्यान्‍न खरीदने के लिए ऋण लेने पर दास बनाए जाने की संभावना वाले लोग इस माह से उत्तरी भारत के 100 गांवों में अनाज पा सकेंगे।

      कार्यकर्ताओं का कहना है कि देश में 1976 से बंधुआ मजदूरी प्रतिबंधित होने के बावजूद अक्सर खाद्यान्‍न खरीदने, उत्‍सव-समारोह मनाने या बीमारी के वास्‍ते लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए लाखों लोगों से बगैर मजदूरी के काम करवाया जाता है ।

    मानसून के दौरान कर्ज लेने की संभावना बढ़ जाती है, क्‍योंकि इस अवधि में खेती या निर्माण कार्य पाना कठिन होता है।

     बंधुआ मजदूरी की समस्‍या पर कार्य करने वाली और इस पहल में सहायक धर्मार्थ संस्‍था प्रगति ग्रामोद्योग एवं समाज कल्याण संस्थान के संस्थापक सुनीत सिंह ने कहा, "लोगों के ऋण बंधन में फंसने का बड़ा कारण भुखमरी है।"

    "इन वंचित परिवारों में संतुलित भोजन की कमी से लोग बीमार हो जाते हैं और इलाज के लिए उन्हें फिर पैसा उधार लेना पड़ता है।"

    वैश्विक दासता सूचकांक 2018 के अनुसार विश्‍व के अन्‍य देशों की तुलना में भारत में सबसे अधिक गुलाम हैं। इसकी 130 करोड़ की आबादी में से लगभग 80 लाख दास हैं। 

     अक्सर पत्थर की खदानों और ईंट भट्ठों में दासता के जाल में फंसने वाले जनजातीय समुदाय के लोगों में भुखमरी की समस्‍या कम करने के लिए 400 से अधिक स्वयं सहायता समूहों का एक संघ उत्तरी भारत के इलाहाबाद में और इसके आसपास अनाज बैंकों की स्थापना करेगा।

     इसके तहत आवश्‍यकता पड़ने पर 5,000 से अधिक घरों के लोग अनाज से भरे ड्रमों से खाद्यान्‍न ले सकेंगे और बाद में उतना ही अनाज वापस लौटाएंगे।

      अधिकत‍र बचाए गए बंधुआ मजदूर सदस्‍यों के संघ प्रगति वाहिनी के संयोजक रोशन लाल ने कहा, "प्रत्‍येक व्‍यक्ति हमेशा काम की तलाश में रहता है।"

     "इन परिवारों के लिए ये कुछ महीने सबसे कठिन होते हैं, क्योंकि बारिश के कारण बहुत कम काम उपलब्ध होता है।"

    अपने पिता के समान बंधुआ मजदूर रहे लाल ने कहा कि इस दौरान इनके घरों में बीमारी और भुखमरी छाई रहती है।

    उन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को फोन पर बताया, "मौजूदा सरकारी सार्वजनिक (खाद्यान्‍न) वितरण प्रणाली से अक्सर सबसे अधिक आवश्‍यकता के समय उन्‍हें अनाज नहीं मिल पाता है।"

    "ऐसी स्थिति में अनाज बैंक कारगर होंगे।"

    कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत सरकार द्वारा संचालित गरीबों के कल्याण की योजना सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज की उपलब्धता अक्सर अनियमित रहती है, क्‍योंकि अमूमन बिचौलिए उच्च कीमतों पर अनाज बेच देते हैं

    अक्‍सर जनजातीय लोग स्टॉक की अनुपलब्धता के कारण वितरण केंद्रों से खाली हाथ लौटते हैं।

    लाल 2015 में तीन अनाज बैंकों के साथ शुरू किए गए प्रयोग में शामिल थे। परिवारों द्वारा लिए जाने वाले अवैध ऋणों को कम करने में इन बैंकों की सफलता से प्रेरित होकर परोपकारी और धर्मार्थ संस्‍थाओं की सहायता से अब इस परियोजना का विस्‍तार किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा, "हम उनके उस कठिन समय को पार करने की व्यवस्था कर रहे हैं जब उनके पास काम नहीं है या उनका वेतन नहीं मिला है। वेतन मिलने पर वे उधार लिया हुआ अनाज वापस कर देंगे।"    

(रिपोर्टिंग-अनुराधा नागराज, संपादन-केटी मिगिरो और क्‍लेयर कोज़ेंस; कृपया थॉमसन रॉयटर्स की धर्मार्थ शाखा, थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन को श्रेय दें, जो मानवीय समाचार, महिलाओं के अधिकार, तस्करी, भ्रष्टाचार और जलवायु परिवर्तन को कवर करती है। देखें news.trust.org)

 

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